Sunday, April 22, 2018



गुप्त ऊष्मा

जब कोई पदार्थ एक भौतिक अवस्था (जैसे ठोस) से दूसरी भौतिक अवस्था (जैसे द्रव) में परिवर्तित होता है तो एक नियत ताप पर उसे कुछ उष्मा प्रदान करनी पड़ती है या वह एक नियत ताप पर उष्मा प्रदान करता है। किसी पदार्थ की गुप्त उष्मा (latent heat), उष्मा की वह मात्रा है जो उसके इकाई मात्रा द्वारा अवस्था परिवर्तन (change of state) के समय अवषोषित की जाती है या मुक्त की जाती है। इसके अलावा पदार्थ जब अपनी कला (फेज) बदलते हैं तब भी गुप्त उष्मा के बराबर उष्मा का अदान/प्रदान करना पड़ता है।
इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सन् १७५० के आसपास जोसेफ ब्लैक ने किया था। आजकल इसके स्थान पर "इन्थाल्पी ऑफ ट्रान्सफार्मेशन" का प्रयोग किया जाता है।

कैलोरीमिति

विश्व का सबसे पहला हिम-कैलोरीमापी : इसे सन् 1782-83 में लैवाशिए और लाप्लास ने विभिन्न रासायनिक परिवर्तनों में उत्पन्न ऊष्मा की मात्रा के निर्धारण के लिये प्रयोग किया था।
किसी रीति से उष्मा के मापन को उष्मामिति या 'कैलोरीमिति' (calorimetry) कहते हैं। किसी रासायनिक अभिक्रिया में या अवस्था परिवर्तन में या किसी भौतिक या रासायनिक परिवर्तन में या किसी जैविक प्रक्रम (बायोलॉजिकल प्रॉसेस) जो ऊष्मा उत्पन्न होती है अवशोषित होती है उसकी मात्रा की माप करके पदार्थों अथवा प्रक्रमों की की विशिष्ट ऊष्माऊष्मा धारितागुप्त ऊष्मा आदि का निर्धारण किया जा सकता है।
ऊष्मामिति का आरम्भ जूल (Joule) के उस प्रयोग से आरम्भ हुआ जो 'कैलोरी के यांत्रिक तुल्यांक' के निर्धारण के लिये किया गया था। वास्तव में यह प्रयोग ऊर्जा के संरक्षण के सिद्धान्त पर आधारित था।
कैलोरीमिति के लिये जो उपकरण उपयोग में लाये जाते हैं उन्हें 'कैलोरीमापी' (calorimeters) कहते हैं!
कैलोरीमिति सिद्धांत(principle of calorimetry) : जब दो भिन्न भिन्न तापों वाली वस्तुओं को परस्पर रखा जाता है, तो ऊष्मा का प्रवाह उच्च ताप वाली वस्तु से निम्न ताप वाली वस्तु में होता है!

रासायनिक समीकरणों को संतुलित करनासंपादित करें

P4O10 + 6 H2O → 4 H3PO4
इस रासायनिक अभिक्रिया को संतुलित करने के लिए सबसे पहले H3PO4 को 4 से गुणा करते P के परमाणुओं को बराबर कर लिया गया। इसके बाद H2O को 6 से गुणा करके H और O के परमाणुओं को बराबर कर लिया गया।
किसी रासायनिक अभिक्रिया को संतुलित करने का अर्थ है कि अभिकारकों और उत्पादों के न्यूनतम पूर्णांक अणुओं की संख्या लिखना ताकि रासायनिक अभिक्रिया में जिन शर्तों का पालन होता है, समीकरण में भी उन नियमों का पालन हो। उदाहरण के लिए निम्नलिखित अभिक्रिया को देखिए-
{\displaystyle a\,\mathrm {Na_{2}CO_{3}} +b\,\mathrm {C} +c\,\mathrm {N_{2}} \longrightarrow d\,\mathrm {NaCN} +e\,\mathrm {CO_{2}} }
इस अभिक्रिया को संतुलित करने का अर्थ है, a, b, c, d, e के न्यूनतम पूर्णांक मान निकालना ताकि किसी भी तत्व के लिए समीकरण के दाएं पक्ष तथा बाएं पक्ष में आये हुए सभी परमाणुओं की संख्या समान हो। a, b, c, d, e आदि गुणांकों का मान सरल गणना द्वारा (hit and try) किया जा सकता है या कुछ मूलभूत नियमों को लगाकर किया जा सकता है। किन्तु दोनों विधियाँ समय लगातीं हैं। इस काम को विधिवत करने की रीति है, युगपत समीकरण बनाकर उन्हें हल करना।
उपरोक्त रासायनिक अभिक्रिया को संतुलित करने कि लिए हम निम्नलिखित युगपत समीकरण बनाते हैं-
{\displaystyle S\ \leftrightarrow \ {\begin{cases}{\mbox{Na}}&\implies 2a=d\\{\mbox{C}}&\implies a+b=d+e\\{\mbox{O}}&\implies 3a=2e\\{\mbox{N}}&\implies 2c=d\\\end{cases}}}
इन समीकरणों को समझना सरल है। उपरोक्त अभिक्रिया के बाएँ पक्ष में सोडियम के 2a परमाणु हैं और दाएँ पक्ष में d परमाणु। अतः {\displaystyle 2a=d}। इसी तरह अन्य समीकरणों को समझ सकते हैं।
समीकरण बनाने के बाद हम देखते हैं कि अज्ञात राशियों की संख्या ५ है जबकि समीकरणों की संख्या केवल ४। इसका अर्थ हुआ कि हम किसी एक अज्ञात राशि का मान अपनी इच्छानुसार चुनते हुए आगे बढ़ सकते हैं। माना हम {\displaystyle a=2}रख देते है तो शेष अज्ञात राशियों के मान ये होंगे: {\displaystyle d=4}{\displaystyle e=3}{\displaystyle c=2} तथा {\displaystyle b=5}। संयोग से ये सभी मान पूर्णांक हैं।
किन्तु यदि हम {\displaystyle a=1} लेकर चले होते तो अन्य अज्ञात राशियों के मान ये होते: {\displaystyle d=2}{\displaystyle e=3/2}{\displaystyle c=1} तथा {\displaystyle b=5/2}, जिनमें कई पूर्णांक नहीं हैं। यदि सभी मानों को 2 से गुणा कर दें तो सभी पूर्णांक हो जायेंगे (ऊपर वाला हल ही मिल जाएगा)। इसी तरह 4, 6, 8, … से गुणा करने पर भी हमें सभी अज्ञात राशियों के मान पूर्णांक प्राप्त होंगे किन्तु समीकरण के गुणांकों का मान न्यूनतम पूर्णांक होना बेहतर माना जाता है। (अर्थात a, b, c, d, e के मानों का महत्तम समापवर्तक (HCF) 1 से अधिक नहीं होना चाहिए।
इस प्रकार उपरोक्त अभिक्रिया का संतुलित रूप यह होगा:
{\displaystyle 2\,\mathrm {Na_{2}CO_{3}} +5\,\mathrm {C} +2\,\mathrm {N_{2}} \longrightarrow 4\,\mathrm {NaCN} +3\,\mathrm {CO_{2}} }

ला-शातैलिए का नियम

रसायन विज्ञान में ला-शतैलिए का नियम (Le Châtelier's principle) किसी रासायनिक साम्य से सम्बन्धित दशाओं को परिवर्तित करने पर उस साम्य पर पड़ने वाले प्रभाव का पूर्वानुमान लगाने में सहायक होता है। इसलिये इसे 'साम्य नियम' ((Equilibrium Law) भी कहते हैं। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन फ्रान्स के वैज्ञानिक हेनरी लुई ला-शातैलिए (Henry Louis Le Châtelier) ने किया था किन्तु कार्ल फर्डिनाण्ड ब्राउन ने भी इसे स्वतन्त्र रूप से इसकी खोज की थी।
यह नियम निम्नलिखित है-
साम्यावस्था में स्थित किसी निकाय (सिस्टम) के सान्द्रण, ताप, आयतन, या दाब में परिवर्तन करने पर वह निकाय अपने को इस प्रकार समायोजित करता है कि किये गये परिवर्तन को (आंशिक रूप से) कम कर सके। इस प्रकार एक नयी साम्यावस्था स्थापित होती है।
इसी को दूसरे तरह से इस प्रकार कह सकते हैं-
साम्यावस्था में स्थित किसी निकाय को बिक्षुब्ध (disturb) करने पर वह तन्त्र अपने आप को इस प्रकार समायोजित करता कि परिवर्तन को निष्प्रभावी बनाया जा सके।

रासायनिक साम्य

जब अग्रक्रिया और पश्चक्रिया की गति समान हो जाती है तो साम्य की स्थिति होती है।
नीला : अग्रक्रिया
लाल : पश्चक्रिया
क्षैतिज अक्ष पर समय तथा उर्ध्व अक्ष पर अभिक्रिया का वेग है।
किसी रासायनिक अभिक्रिया के सन्दर्भ में रासायनिक साम्य (chemical equilibrium) उस अवस्था को कहते हैं जिसमें समय के साथ अभिकारकों एवं उत्पादों के सांद्रण में कोई परिवर्तन नहीं होता। प्रायः यह अवस्था तब आती है जब अग्र क्रिया (forward reaction) की गति पश्चक्रिया (reverse reaction) की गति के समान हो जाती है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि अग्रक्रिया एवं पश्च क्रिया के वेग इस अवस्था में शून्य नहीं होते बल्कि समान होते हैं।
यदि उच्च ताप (५०० डिग्री सेल्सियस) पर किसी बंद प्रक्रिया पात्र में हाइड्रोजेन तथा आयोडीन को आण्विक अनुपात में साथ साथ रखा जाए, तो निम्नांकित क्रिया प्रारंभ होती है :
H2 + I2 --> 2HI
इस क्रिया में हाइड्रोजन तथा आयोडीन के संयोग से हाइड्रोजेन आयोडाइड बनता है तथा समय के साथ हाइड्रोजेन आयोडाइड की मात्रा में वृद्धि होती है। इस क्रिया के विपरीत, यदि शुद्ध हाइड्रोजेन आयोडाइड गैस को ५०० डिग्री सेल्सियस तक क्रियापात्र में गरम किया जाए, तो इस यौगिक का विपरीत क्रिया के द्वारा विघटन होता है, जिससे हाइड्रोजन आयोडाइड का हाइड्रोजन तथा आयोडीन में विघटन हो जाता है तथा इन उत्पादों के अनुपात में समय के साथ साथ वृद्धि होती है। यह क्रिया निम्नांकित रूप में होती हैं :
2HI --> H2 + I2
उपर्युक्त दोनों ही क्रियाओं में क्रिया की गति क्रमश: मंद होती जाती है और अंत में पूर्णत: स्थिर हो जाती है। रासायनिक क्रिया की इस स्थिति को रासायनिक साम्यावस्था कहते हैं। क्रिया के साम्यावस्था मिश्रण में उपर्युक्त पदार्थों की आपेक्षिक मात्रा एक ही रहती है, चाहे यह क्रिया हाइड्रोजेन और आयोडीन के संयोग से हाइड्रोजेन आयोडाइड बनाने की हो, अथवा हाइड्रोजेन आयोडाइड के विघटन से हाइड्रोजन तथा आयोडीन में पृथक्करण हो, अथवा तीनों संघटकों के साम्यावस्था संतुलन मिश्रण की प्रक्रिया हो, जिसमें हाइड्रोजेन तथा आयेडीन परमाणुओं की समान संख्या उपस्थित रहती है। इसके अतिरिक्त प्रयोगशाला के परिणामों में यह पाया जाता है कि चाहे हाइड्रोजेन तथा आयोडीन के परमाणुओं की समस्त संख्या समान हो अथवा नहीं, दोनों ही दशाओं में समान ताप पर तैयार किए हुए साम्यावस्था मिश्रणों की सामयावस्था सांद्रता, अथवा साम्यावस्था दबाव के निम्नांकित अनुपातों का मान, स्थिर रहता है.
निम्नलिखित सामान्य अभिक्रिया को लेते हैं-
aA + bB  yY + zZ ,
जहाँ ABY और Z अभिक्रिया के भाग लेने वाले रसायन हैं तथा aby और z और A संतुलित अभिक्रिया में अणुसंख्या है, तो :
K_c इस अभिक्रिया का (सान्द्रता) का साम्यावस्था नियतांक कहते हैं। उपर्युक्त समीकरण में यदि गैसें सम्मिलित हों तो उनके मोलर सान्द्रण के स्थान पर उनका आंशिक दाब भी लिया जा सकता है तथा इस प्रकार प्राप्त साम्यावस्था नियतांक को Kp कहते हैं।
उदाहरण
2 SO2(g) + O2(g)  2 SO3(g)
इस अभिक्रिया का साम्यावस्था नियतांक निम्नलिखित प्रकार से अभिव्यक्त किया जायेगा-:
सभी प्रकार की रासायनिक क्रियाओं में उपर्युक्त सिद्धांत लागू होते हैं, परंतु अनेक क्रियाओं में साम्यावस्था की दशा में क्रिया में भाग लेनेवाले तथा वचनेवाले उत्पादों की मात्रा इतनी कम होती है कि क्रिया की अपूर्णता का परीक्षणों द्वारा अनुमापन नहीं किया जा सकता है।