Tuesday, April 17, 2018

पास्कल का सिद्धान्त: जल-स्तम्भ के दबाव के कारण पीपे (barrel) का फटना। सन् १६४६ में पास्कल ने यही प्रयोग किया था।
पास्कल का सिद्धान्त या पास्कल का नियम द्रवस्थैतिकीमें दाब से सम्बन्धित एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। इसे फ्रांसीसी गणितज्ञ ब्लेज पास्कल ने प्रतिपादित किया था। यह सिद्धान्त इस प्रकार है -
सब तरफ से घिरे तथा असंपीड्य (incompressible) द्रव में यदि किसी बिन्दु पर दाब परिवर्तित किया जाता है (घटाया या बढ़ाया जाता है) तो उस द्रव के अन्दर के प्रत्येक बिन्दु पर दाब में उतना ही परिवर्तन होगा।



सूत्रसंपादित करें

  • h1 और h2 गहराई पर स्थित दो बिन्दुओं पर दाब का अन्तर :
{\displaystyle P_{2}-P_{1}=\rho g(h_{1}-h_{2})\,}
जहाँ {\displaystyle \rho } (rho), द्रव का घनत्व हत तथा g गुरुत्वजनित त्वरण है।
अतः h गहराई पर स्थित किसी भी बिन्दु पर दाब का मान निम्नलिखित सूत्र से प्राप्त किया जा सकता है:
{\displaystyle P=P_{0}-\rho gh\,}
जहाँ P0 द्रव की सतह पर दाब का मान है। यदि द्रव 'खुली हवा' में है तो P0 = [[वाणुमण्डलीय दाब)
  • सब प्रकार से घिरे किसी द्रव के Si क्षेत्रफल पर Fi बल लगाया जाय और उसके परिणामस्वरूप द्रव के किसी अन्य क्षेत्रफल Sf पर Ff बल लगे तो
{\displaystyle Fi/Si=Ff/Sf\,}

उपयोगसंपादित करें

बांधों, जल टॉवर एवं कुओं में

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